छंद किसे कहते है, छंद की परिभाषा | Chhand Kise Kahate Hain

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Chhand Kise Kahate Hain

Chhand Kise Kahate Hain : यदि आप हिंदी पढ़ने में रुचि रखते हैं, तो आपने ” छंद ” का नाम कई बार सुना होगा। हिंदी भाषा में कई प्रकार के छंद होते हैं।

हिंदी इतिहास में हिंदी काव्य के महा कवियों ने कई ” छंद ” प्रस्तुत किए हैं। वैसे तो हम में से अधिकतर लोग छंद से परिचित है। लेकिन ऐसी और भी कई बातें हैं, जो हमें नहीं पता है।

आज हम आपको ” छंद ” के बारे में पूर्ण जानकारी देने जा रहे हैं। इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे, कि छंद किसे कहते हैं ( Chhand Kise Kahate Hain ) और साथ ही साथ इसके तीन अन्य प्रकार के बारे में भी बात करने जा रहे हैं। अगर आप भी छंद के बारे में बारीकी से ज्ञान इकट्ठा करना चाहते हैं, तो हमारे आर्टिकल को ध्यान से पढ़ें। तो चलिए शुरू करते हैं।


छंद किसे कहते हैं ? | Chhand Kise Kahate Hain

जब वर्णों की संख्या, क्रम, मात्र-गणना तथा यति-गति आदि नियमों को ध्यान में रखकर पद्य रचना की जाती है, उसे छंद कहते हैं।

छंद को काव्य सौंदर्य के अंतर्गत पढ़ा जाता है। छंद हिंदी काव्य का एक अभिन्न अंग है। इसकी शैली बाकियों से भिन्न होती है और यही कारण है, कि छंद को पढ़ने के बाद मन को एक अलग सा ही आनंद मिलता है।


छंद की परिभाषा | Chhand Ki Paribhasha 

वर्णों या मात्राओं के नियमित संख्या के विन्यास से यदि आह्लादित पैदा हो, तो उसे छंद कहते हैं।

ऋषि पिंगल को छंद शास्त्र का प्रणेता कहा जाता है। यही कारण है, कि छंद को पिंगल नाम से भी जाना जाता है।

प्राचीन भारत के तीन वेदों में से ऋग्वेद में भी छंद का जिक्र देखने को मिलता है। ऋग्वेद में छंद का उल्लेख साफ तौर पर देखा जा सकता है। जिस प्रकार गधे का व्याकरण नियामक होता है, उसी प्रकार पद्य का छंद शास्त्र है।

ऊपर हमने आपको Chhand Kise Kahate Hain के बारे में बताया, चलिए अब छंद के अंगों ( Chhand Ke Ang ) के बारे में जानते हैं।


छंद से संबन्धित पारिभाषिक शब्द ( छंद के अंग ) | Chhand Ke Ang

छंद के मुख्य 7 अंग होते हैं। यह निम्नानुसार है-

  • चरण  / पद / पाद
  • वर्ण और मात्रा
  • संख्या और क्रम
  • गण
  • गति
  • यति / विराम
  • तुक

1. चरण / पद / पाद

आमतौर पर छंद के 4 भाग होते हैं। इन्हें पुर्णविराम से अलग किया जाता है। इन अलग किए गए भागों में से चतुर्थ भाग को चरण / पद / पाद कहतें हैं।

यहां पर ध्यान देने योग्य बात यह है, कि हर पाद में वर्णों या मात्राओं की संख्या निश्चित होती है।

चरण / पद / पाद के दो प्रकार होते हैं –

समचरण – दूसरे और चौथे चरण को समचरण कहा जाता है।

विषमचरण – पहले और तीसरे चरण को विषमचरण कहा जाता है।

2. वर्ण और मात्रा

किसी भी वर्ण को उच्चारित करने के तरीके को मात्रा कहते हैं। छंद शास्त्र में स्वरों को ही वर्ण माना गया है।

यह दो प्रकार की होती हैं – ह्रस्व और दीर्घ, जिसमे ह्रस्व को लघु और दीर्घ को गुरु पढ़ा जाता है।

लघु वर्ण :-

लघु वर्ण के उच्चारण में एक मात्रा का समय लगता है। अ, इ, उ, ऋ आदि  लघु वर्ण हैं, इसका का चिह्न ‘।’ है।

दीर्घ वर्ण :-

लघु कि अपेक्षा दीर्घ वर्ण के उच्चारण में दुगुना समय लगता है। आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ आदि गुरु वर्ण हैं, इसका चिह्न (ऽ) है।

यहां पर ध्यान देने योग्य बातें यह है, कि –

  • जिस ध्वनि में स्वर ना हो उन्हें वर्ण नहीं माना जा सकता।
  • संयुक्ताक्षर के पूर्ववर्ती वर्ण को गुरु वर्ण माना जाता है।
  • चंद्रबिंदु और अनुस्वार को लघु तथा विसर्ग को गुरु माना जाता है।
  • हलंत वर्ण के पहले का वर्ण भी गुरु वर्ण के अंतर्गत आता है।
  • संयुक्त व्यंजन वाले वर्ण को लघु वर्ण माना जाता है।

3. संख्या और क्रम

वर्णों की मात्रा गणना करने को संख्या कहा जाता हैं। और लघु-गुरु के क्रम को निर्धारित करने को क्रम कहा जाता हैं।



4. गण

गण को तीन वर्णों का समूह माना जाता है। सरल शब्दों में समझें तो इसे लघु-गुरु के नियत कर्म से तीन वर्णों के समूह को गण कहा गया है।

इनकी संख्या 8 होती है, जो निम्नलिखित हैं :- यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण तथा सगण।

5. गति

छंद में मधुरता और गेयता काफी महत्वपूर्ण होती है। मधु चलाने के लिए निश्चित वर्णों या मात्राओं तथा यति के प्रयोग से विशेष प्रकार की संगीतात्मक लय निकाला जाता है और गेयता उत्पन्न की जाती है। इसी संगीतात्मक लय को गति कहते हैं।

6. यति / विराम

छंद पढ़ते समय एक नियमित रूप से सांस लेने के लिए रुका जाता है। इस ही रुकने वाले स्थान को या सांस लेने वाले स्थान को यति या विराम कहा जाता है। आमतौर पर छोटे छंदों में विराम स्थान अंतिम में होते है, जबकि बड़े-बड़े छंदो में विराम स्थान बीच-बीच में ही होता है।

7. तुक

छंद के प्रत्येक चरण के अंत में या वर्णों की समानता देखने को मिलती है। इसे अक्षर मैत्री कहा जाता है। और इसी को छंदों में तुक का नाम दिया गया है। जिस छंद में तुक होता है, उसे तुकान्त तथा जिसमे छन्द में तुक नहीं होता है, उसे अतुकान्त कहते हैं।

ऊपर हमने आपको Chhand Kise Kahate Hain, Chhand Ki Paribhasha के बारे में बताया, चलिए अब Chhand Ke Prakar के बारे में जानते हैं।



छंद के प्रकार | Chhand Ke Prakar

छंद मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं। यह निम्नलिखित हैं –

1. वर्णिक छंद :-

जब छंदों में केवल वर्णों की संख्या और नियमों का पालन किया जाता है, तो उसे वर्णिक छंद कहते हैं।

वर्णिक छंद के सभी चरणों में वर्णों की संख्या समान रहती है और इसी प्रकार से इसमें लघु तथा गुरुओं की संख्या भी समान रहती है।

2. मात्रिक छंद :-

जिस प्रकार से हमें नाम से ही ज्ञात होता है, कि मात्रिक छंद – मात्राओं से संबंधित होता है। अतः इसकी परिभाषा यह है, कि जिन छंदों की रचना मात्राओं की गणना के आधार पर की जाती है, उन्हें मात्रिक छंद कहते हैं। मात्रिक छंद के सभी चरणों में मात्राओं की संख्या सामान रहती है।

मात्रिक छंद के प्रकार :-

मुक्तक या रबड़ छंद

मुक्तक या रबड़ छंद को हिंदी काव्य के महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की देन माना जाता है। भक्ति काल तक इस प्रकार के छंद का कोई अस्तित्व नहीं था।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी ने हीं इस छंद की रचना की। मुक्तक छंद नियमबद्ध नहीं होते। जिसका अर्थ है , कि मुक्तक या रबड़ छंद में नियम नहीं होता है, सिर्फ़ स्वछंद गति और भावपूर्ण यति ही मुक्तक छंद की पहचान हैं।


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अन्तिम शब्द :-

तों दोस्तों, आज के इस आर्टिकल – Chhand Kise Kahate Hain में हमने जाना की छंद किसे कहते है, छंद के कितनें प्रकार है।

उम्मीद करते हैं, कि अब आपको छंद के बारे में सभी महत्वपूर्ण बातें ( Chhand Kise Kahate Hain ) मालूम हो गई होंगी। आशा करते हैं, आपको आज का यह आर्टिकल पसंद आया होगा।

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