वेदों की संख्या कितनी है ?

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Vedon Ki Sankhya Kitni Hai

आज हम आपसे बात करेंगे, हिंदू धर्म ग्रंथ के वेदों के बारे में – वेदों की संख्या कितनी है ? ( Vedon Ki Sankhya Kitni Hai ) और प्रत्येक वेदों में क्या क्या हैं।

वेदों को हिंदू धर्म ग्रंथ के प्राचीनतम धर्म ग्रंथों में से माना जाता है। जिनके बारे में अक्सर प्रतियोगी परीक्षाओं में भी प्रश्न पूछे जाते हैं। तो आइए जानते हैं, कि वेद कितने प्रकार के हैं और किस वेद में क्या-क्या हैं।


वेदों की संख्या कितनी है ? | Vedon ki Sankhya Kitni Hai

Vedon Ki Sankhya Kitni Hai: हिन्दू धर्म में वेदों की संख्या चार है। जिनका नाम है :-

  • ऋग्वेद
  • यजुर्वेद
  • सामवेद
  • अथर्ववेद

जिनमें से अथर्ववेद को सबसे प्राचीनतम वेद माना जाता है।

हिन्दू धर्म में वेदों को सबसे प्राचीन पुस्तक माना जाता है। माना जाता है, कि इसे ईश्वर के बताए अनुसार ऋषि – मुनियों द्वारा लिखित रूप दिया गया। सभी अलग-अलग वेदों में अलग-अलग प्रकार के ज्ञान की जानकारी दी गई है।

जैसे :- गणित, औषधि, योगा ज्योतिष, प्रकृति, ब्रह्मांड, रसायन और इतिहास आदि।


Vedon Ki Sankhya Kitni Hai 

1. ऋग्वेद :- 

ऋक यानि स्थिति और ज्ञान। इस वेद के 10 मंडल यानि अध्याय हैं। जिनमे 1028 सुक्त हैं, जिनमें 11 हज़ार मन्त्र हैं। इस वेद की पांच शाखाएं हैं।

  • शाकल्प
  • वास्कल
  • अश्वलायन
  • शांखायन
  • मंडूकायन
  1. ऋग्वेद में देवताओं की प्रार्थना स्तुतिया और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है।
  2. ऋग्वेद में चिकित्सा से संबंधित विश्व के बारे में भी जानकारी दी गई है जैसे:- जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा और चिकित्सा मानव चिकित्सा और हवन द्वारा की जाने वाली चिकित्सा।
  3. ऋग्वेद में चिकित्सा के साथ-साथ औषधि सुख तो यानी दवाओं का विज्ञान मिलता है।
  4. इसमें औषधियों की संख्या 125 के आसपास बताई गई है, जो कि 107 स्थानों पर पाई जाती है। औषधि में सोम शब्द का विशेष वर्णन किया गया है।
  5. ऋग्वेद का उपवेद आयुर्वेद को कहा जाता हैं।

2. यजुर्वेद:-

यत् +जु, यत् का अर्थ है – गतिशील तथा ” जु” का अर्थ है – आकाश। यजुर्वेद में यज्ञ करने की विधियां और यज्ञ में प्रयोग की जाने वाले मंत्र के बारे में बताया गया है।

  1. यजुर्वेद में यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन किया गया है, तत्वज्ञान का अर्थ होता है – रहस्यमय ज्ञान।
  2. रहस्यमय ज्ञान यानि ब्रह्मांड, आत्मा, ईश्वर और पदार्थ का ज्ञान। सरल भाषा में हम कह सकते हैं, कि हम ब्रह्मांड आत्मा ईश्वर और पदार्थ के बारे में ज्ञान की प्राप्ति के लिए यजुर्वेद का अध्ययन कर सकते हैं।
  3. यजुर्वेद को गद्य में लिखा गया है, इसमें यज्ञ की प्रक्रिया के लिए गद्य मंत्र लिखे हैं।
  4. यजुर्वेद का उपवेद हैं- धनुर्वेद। यजुर्वेद की दो शाखाएं हैं – कृष्ण और शुक्ल।

कृष्ण:- वैषम्पायन ऋषियों का संबंध कृष्ण से है। कृष्ण की भी 4 शाखाएं हैं।

शुक्ल:- याज्ञवल्क्य ऋषि यों का संबंध शुक्ल से है। शुक्ला की भी दो शाखाएं हैं जिसमें 40 मंडल हैं।

3. सामवेद:-

सामवेद सभी वेदों में सबसे छोटा वेद है। इस वेद में गीत और संगीत का ज्ञान दिया गया है। शाम शब्द का अर्थ होता है ‘ गान ‘ प्राचीन आर्य द्वारा शाम ज्ञान किया जाता था, जिसका उल्लेख सामवेद में किया गया है।

  1. सामवेद के मंत्रों को देवताओं की स्तुति के समय गाया जाता था।
  2. सामवेद में कुल 1875 रचनाएं हैं। इन रचनाओं में से 75 रचनाओं के अलावा अन्य सभी रचनाएं ऋग्वेद से ली गई है।
  3. सामवेद की तीन महत्वपूर्ण शाखाएं हैं। कौथुमीय जैमिनीय तथा राणायनिय।
  4. सामवेद के प्रमुख देवता सूर्य है। क्योंकि इसमें मुख्य रूप से सूर्य की स्तुति के मंत्र हैं। लेकिन इसके साथ-साथ सामवेद में इंद्र सोम का भी पर्याप्त वर्णन किया गया है।
  5. सामवेद को भारतीय संगीत का मूल भी कहा जा सकता है, क्योंकि इसका भारतीय संगीत के इतिहास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान है।
  6. सामवेद में दिए गए मंत्र यज्ञ, अनुष्ठान और हवन के समय गाए जाते थे। इसमें मूल रूप से 99 मंत्र है।
  7. सामवेद का उपवेद हैं – गंधर्व वेद।

4. अथर्ववेद:-

अथर्ववेद को ब्रह्म वेद भी कहा जाता है। इस वेद में देवताओं की उस तिथियों के साथ-साथ चिकित्सा, विज्ञान और दर्शन के मंत्र भी हैं। माना जाता है, कि अथर्व वेद का ज्ञान ईश्वर ने सबसे पहले महा ऋषि अंगिरा को दिया था, फिर महर्षि अंगिरा ने वह ज्ञान ब्रह्म को दिया।

  1. अथर्व वेद में कुल 20 काण्ड 730 सुक्त तथा 5987 मंत्र तथा 8 खण्ड हैं।
  2. अथर्ववेद में ब्रह्म ज्ञान औषधि प्रयोग, रोग निवारण ज्ञान, जंत्र- तंत्र तथा टोना टोटका आदि का ज्ञान दिया गया है।
  3. थर्व का अर्थ होता है – कंपन तथा अथर्व का अर्थ होता है – अकंपन यानि कि ज्ञान के माध्यम से श्रेष्ठ कर्म करते हुए, जो परमात्मा की उपासना में लीन रहता है, वहीं अकंप बुद्धि को प्राप्त होकर मोक्ष धारण करता है।
  4. सर्वप्रथम अथर्ववेद को वेद नहीं माना जाता था, क्योंकि इसमें दिए गए विषय व मूल भावना तीनों वेदों से अलग थी। परंतु बाद में इसे वेदों में शामिल कर लिया गया।
  5. अथर्ववेद का उपवेद है – ” स्थापत्य वेद “।


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निष्कर्ष:-

उम्मीद है, आपको हमारा यह लेख वेदों की संख्या ( Vedon Ki Sankhya Kitni Hai ) जरूर पसंद आया होगा। इस लेख में चारों वेदों के बारे में सभी जानकारी को सरल भाषा में समझाने की पूरी कोशिश की गई है।

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